बीते अगस्त में न्यूज़लॉन्ड्री ने एक की थी. इसमें सामने आया था कि उत्तराखंड में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान थोक फॉर्म-7 आवेदनों के ज़रिये मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है.
राज्य के कई विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा कार्यकर्ताओं ने हज़ारों फॉर्म-7 आवेदन दाखिल किए. इनमें ज़्यादातर आपत्तियां मुस्लिम मतदाताओं के ख़िलाफ थीं.
उधम सिंह नगर जिले की किच्छा विधानसभा में 6,884 फॉर्म-7 आपत्तियों दर्ज हुई जिसमें से 5,359 राजेश तिवारी ने की थीं. तिवारी भाजपा से जुड़े बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) हैं. वह पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के करीबी और उधम सिंह नगर में भाजपा के जिला प्रकोष्ठ संयोजक हैं. पूरे उत्तराखंड में सबसे ज़्यादा फॉर्म-7 आपत्तियां इन्होंने ही दाखिल कीं.
न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में तिवारी ने दावा किया कि स्थानीय निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) ने शुरू में थोक फॉर्म-7 आपत्तियां लेने से इनकार कर दिया था. उनके मुताबिक़ ईआरओ का कहना था कि भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. इसके बाद उन्होंने इसीआई को ईमेल कर ईआरओ की शिकायत की और साथ ही अपनी आपत्ति भेजी. न्यूज़लॉन्ड्री इस ईमेल की विषय-वस्तु की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका है.
तिवारी ने कहा, “ईमेल भेजने के दो दिन के भीतर ईआरओ कार्यालय से फोन आया और मुझसे आपत्तियां जमा करने को कहा गया.”
हमने उत्तराखंड के सीईओ, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दोनों निर्वाचन आयुक्तों, आयोग के मीडिया विभाग को सवाल ईमेल किए, जिसमें तिवारी के इस दावे पर सवाल हैं कि क्या ईसीआई ने ईआरओ को उनकी थोक फॉर्म-7 आपत्तियां स्वीकार करने का निर्देश दिया था. ईसीआई ने हमारा ईमेल प्राप्त होने की पुष्टि की और हमारा फोन नंबर मांगा, लेकिन हमारे सवालों के जवाब नहीं दिए. जवाब मिलने पर हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगे.
किच्छा के ईआरओ गौरव पांडे ने इन दावों की न पुष्टि की, न खंडन. उन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा, “हमारा एसआईआर पूरा हो चुका है. दावे और आपत्तियां हमने सुन ली हैं और वह प्रक्रिया भी समाप्त हो गई है. इसके अलावा मैं इस पर कुछ नहीं कह सकता.”
जब पूछा गया कि क्या तिवारी की आपत्तियों पर उन्हें ईसीआई से कोई विशेष निर्देश मिला था, तो उन्होंने कहा, “इस पर मैं कुछ नहीं कह सकता.” उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया दो महीने पहले हुई थी और उन्हें सारी बातें याद नहीं हैं. नाम हटाए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा, “हमने जो भी किया है, वह ईसीआई के नियमों के अनुसार किया है.”
उत्तराखंड में दावे और आपत्तियों की अवधि 13 अगस्त को समाप्त हो गई थी और उसे बढ़ाया नहीं गया था. हालांकि उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईवो) कार्यालय के फॉर्म-10 डेटा के मुताबिक़, तिवारी की 5,359 स्वीकृत फॉर्म-7 आपत्तियों में से 504 पर 14 अगस्त को स्वीकृत हुई है. हमने उत्तराखंड के सीईओ और किच्छा के ईआरओ को ईमेल कर पूछा है कि समय-सीमा बीतने के एक दिन बाद ये आपत्तियां क्यों स्वीकार की गईं. जवाब आने पर हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगे.
न्यूज़लॉन्ड्री ने किच्छा में आगे पड़ताल कि, तिवारी की आपत्तियों वाले कितने नाम कटे. 3 अक्टूबर को उत्तराखंड में फाइनल मतदाता सूची जारी हुई जिसमें 4,390 नाम कटे है. इनमें से क़रीब 670 मतदाता ऐसे थे जिनके ख़िलाफ अगस्त में फॉर्म-7 के तहत आपत्ति दर्ज की गई थी. इनमें से 509 आपत्तियां तिवारी ने दाखिल की थीं. बाक़ी 3,720 नामों के ख़िलाफ़ कोई आपत्ति दाखिल नहीं थी. ईआरओ ने इन मतदाताओं के नाम “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” के आधार पर हटाए.
हमने तिवारी से पूछा कि उन्होंने इतनी आपत्तियां क्यों दाखिल कीं और उनके निशाने पर आए सभी नाम मुस्लिम क्यों थे? तिवारी ने कहा कि पार्टी को जानकारी मिली थी कि किच्छा के करीब 6,000 मतदाताओं के नाम, उनके माता-पिता के नामों के साथ, पड़ोसी उत्तर प्रदेश में भी दर्ज नामों से मैच हो रहे थे. ये नाम बहेड़ी, बिलासपुर, रामपुर, मीरगंज और पीलीभीत विधानसभा क्षेत्रों में हैं. उनके मुताबिक़ जनवरी में उत्तर प्रदेश की अंतिम मतदाता सूची छपी, तो पार्टी ने उसे हासिल कर लिया. इसके बाद पार्टी के बीएलए और कार्यकर्ताओं ने इन मतदाताओं की सूची बनाई. सूची में उनके एपिक नंबर भी थे. यह सूची किच्छा के ईआरओ को सौंप दी गई.
सारे नाम मुस्लिम क्यों थे, इस पर तिवारी ने दावा किया, “हमारे पड़ोसी इलाक़ों में ज़्यादातर लोग मुसलमान हैं जो यहां आकर बस गए हैं. इसके अलावा, हमारे क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या तेज़ी से बढ़ी है, जबकि हिंदू मतदाताओं के नाम ज़्यादा कटे हैं, क्योंकि वे दूसरी जगहों पर चले गए हैं.”
एजेंसी चाणक्या के अनुसार, किच्छा के 28.4% मतदाता मुस्लिम हैं, जो उत्तराखंड की आबादी में समुदाय की हिस्सेदारी के दोगुने से भी ज़्यादा है. 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार तिलक राज बेहड़ ने दो बार के विधायक रहे शुक्ला को 10,000 से ज़्यादा वोटों से हराया था. तिवारी ने कहा, “मेरे नाम से लगभग 6,000 आपत्तियां दाखिल हुईं. लेकिन अंतिम सूची देखकर लगता है कि ज़्यादा नाम नहीं कटे हैं. मुझे एसईआर में कुछ भी गलत नहीं दिखता. यह ठीक से हुआ, कोई ग़लती नहीं हुई.”
किच्छा से कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ ने भी ऐसा ही दावा किया. उनके मुताबिक़ ईआरओ ने उन्हें बताया था कि आपत्तियां इसलिए स्वीकार की जा रही हैं क्योंकि भाजपा ने उनके खिलाफ शिकायत की थी.
बेहड़ ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा की दाखिल की गई आपत्तियां झूठी और ग़लत जानकारी पर आधारित थीं. उन्होंने कहा, “हमने ऐसे 100 लोगों की सूची तैयार की, जिनके बारे में भाजपा ने ग़लत जानकारी दी थी, और उसे चुनाव आयोग व वरिष्ठ अधिकारियों को सौंपा. चुनाव आयोग की मंशा बिल्कुल साफ़ नहीं है. वे ज़्यादा से ज़्यादा नाम काटना चाहते हैं.”
आपत्ति कुछ, नोटिस कुछ और
हम किच्छा के उन मतदाताओं से मिले जिनके नाम अंतिम सूची से ग़ायब हैं. कई तिवारी की आपत्तियों के निशाने पर थे, जिनमें दावा किया गया था कि वे कहीं और “पहले से पंजीकृत” हैं, जबकि ईआरओ के नोटिसों में उन्हें बिल्कुल अलग कारण बताए गए, जैसे 2002-03 की सूची से गलत मैपिंग. इनमें से ज़्यादातर ने तिवारी का नाम तक नहीं सुना था.
सिरौली कलां की 25 वर्षीय, दो बच्चों की मां कुलसुम को हमारे मिलने तक पता ही नहीं था कि उनका नाम कट चुका है. नोटिस में लिखा था, “आपके और आपके माता-पिता की उम्र में 50 साल से ज़्यादा का अंतर है, जिनके विवरण का उपयोग आपको पिछले एसआईआर में तैयार मतदाता सूची से जोड़ने के लिए किया गया था. ऐसा प्रतीत होता है कि यह ग़लत मैपिंग के कारण हुआ है.”
अगस्त में नोटिस मिलने के बाद कुलसुम ने आधार कार्ड, परिवार रजिस्टर की नक़ल, राशन कार्ड और 2002-03 की मतदाता सूची का ब्योरा जमा किया. उन्होंने कहा, “ये दस्तावेज़ जमा करने के बाद अधिकारी ने मुझसे कहा था कि अब आपका नाम मतदाता सूची में ठीक कर दिया जाएगा, लेकिन मेरा नाम फिर भी काट दिया गया.”
55 वर्षीय मोहम्मद रहीस का नाम भी अंतिम सूची में नहीं है. उनका परिवार इस इलाक़े में 30 साल से रह रहा है और घर के नौ में से आठ सदस्यों के नाम अंतिम सूची में हैं. उनके बेटे मोहम्मद नसीम ने बताया कि परिवार ने पिता के दस्तावेज़ दो बार जमा किए, फिर भी नाम हटा दिया गया.
तिवारी की आपत्तियों से प्रभावित 26 वर्षीय फ़रमान किच्छा के बूथ नंबर 128 पर पंजीकृत थे. उनका जन्म किच्छा में हुआ है और उनके मुताबिक़ उन्होंने 2022 और 2024 दोनों चुनावों में वोट डाला था. उनका दावा है कि उन्हें न ईआरओ से कोई नोटिस मिला, न बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) का फ़ोन आया. उन्होंने कहा, “अगर आप किसी का नाम काट रहे हैं, तो कम से कम उसे बताइए ताकि वह अपना पक्ष रख सके.”
निशा बूथ नंबर 96 पर पंजीकृत हैं. उनका नाम भी तिवारी की आपत्ति के बाद अंतिम सूची से ग़ायब मिला. उन्होंने कहा, “मैंने कहीं और नामांकन नहीं कराया है. मेरे पास सिर्फ एक वोटर आईडी है.”
इसी बूथ नंबर 96 पर एक परिवार के पांच में से तीन सदस्य, सना, आमिर और इराम, भी अंतिम सूची से ग़ायब हैं. तिवारी ने सना और आमिर के ख़िलाफ़ फॉर्म-7 आपत्तियां दाखिल की थीं, लेकिन तीनों को मिले नोटिस में लिखा था, “आपकी और आपके दादा या मां की उम्र में 40 साल से कम का अंतर है.” तिवारी की आपत्तियों वाले नामों के हटाए जाने के बारे में पूछे जाने पर ईआरओ गौरव पांडे ने कहा, “जो भी प्रक्रिया अपनाई गई होगी, वह नियमों के अनुसार ही होगी.”
आपत्ति के बिना भी कटे नाम, फिर फॉर्म-6 का निर्देश
किच्छा में हर नाम कटने का संबंध तिवारी की आपत्तियों से नहीं है.
यहां के 72 वर्षीय इस्माइल का जन्म यहीं हुआ. उनके सात भाइयों में से छह की मौत हो चुकी है.
इनके परिवार के छह में से पांच सदस्यों के नाम कट गए है. अंतिम सूची में सिर्फ उनकी पत्नी नईम का नाम बचा है. एसआईआर के दौरान परिवार ने सारे दस्तावेज़ एक बार नहीं, दो बार जमा किए थे. इस्माइल ने बताया, “12 अक्टूबर को बीएलओ ने मुझे बताया कि मेरा और मेरे परिवार के सदस्यों का नाम मतदाता सूची से हट गया है. फिर उसने मुझसे फॉर्म-6 के ज़रिये नए सिरे से आवेदन करने को कहा.”
फॉर्म-6 पहली बार नामांकन कराने वालों के लिए होता है. कुरैया गांव के बूथ नंबर 12 पर आरिफ और उनकी बहन शमीम, दोनों के नाम सूची से हटा दिए गए. तिवारी ने दोनों के ख़िलाफ आपत्तियां दाखिल की थीं. आरिफ़ ने न्यूज़लॉन्ड्री को वह ओटीपी और रेफ़रेंस मैसेज दिखाया जो नया फॉर्म-6 भरने के बाद उन्हें चुनाव आयोग से मिला था. संदेश में लिखा था कि आवेदन पहली बार मतदाता पंजीकरण के लिए है.
जैसा कि न्यूज़लॉन्ड्री ने पहले रिपोर्ट किया था, ईसीआई ने एसआईआर प्रक्रिया के दौरान सूची से हटाए गए मतदाताओं के लिए फॉर्म-6 को उपाय के तौर पर पेश किया है, जबकि इस फॉर्म में आवेदक को यह घोषणा करनी होती है कि वह पहली बार नामांकन कर रहा है.
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि इससे आवेदक जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के दायरे में आ सकते हैं, जिसमें झूठी घोषणा पर एक साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है. उनका यह भी कहना है कि इस प्रक्रिया में मौजूदा मतदाताओं को नया मतदाता माना जा रहा है और उनका पहले का नामांकन बहाल नहीं किया जा रहा.
हमने किच्छा के ईआरओ , उत्तराखंड के सीईओ, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, अन्य निर्वाचन आयुक्तों और इसीआई को सवाल ईमेल किए हैं. इनमें इस रिपोर्ट में बताए गए नाम कटने के मामलों और हटाए गए मतदाताओं से फॉर्म-6 के ज़रिये दोबारा आवेदन कराए जाने के बारे में पूछा गया है. साथ ही हमने पूछा कि तिवारी का फॉर्म 7 कबूल करने में इलेक्शन कमीशन की क्या भूमिका रही. खबर प्रकाशित किए जाने तक जवाब नहीं आया. अगर जवाब आता है तो उसे खबर में जोड़ दिया जाएगा.
देखिए ये वीडियो रिपोर्ट.

